‘खतरों को देखते हुए हिन्दुओं को सामुदायिक नेतृत्व की ज़रूरत’: RSS पर एक ऐसे संघी के विचार, जो कभी शाखा नहीं गया

(यहाँ प्रस्तुत उद्धरण ‘Sanghi Who Never Went To A Shakha’ किताब से लिया गया है और इसे हाल ही में आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत के हिन्दू-मुस्लिम एकता और दोनों समान पूर्वजों के बयान के संदर्भ में पुनः प्रकाशित किया जा रहा है।)

चूंकि मैंने खुद को एक ‘संघी’ के रूप में पहचाना है और अपनी किताब के शीर्षक में भी इसका जिक्र किया है, मैंने सोचा कि मैं विशेष रूप से यह स्पष्ट कर दूँ कि इस किताब में प्रस्तुत मेरे विचार एक आरएसएस विचारक अथवा स्वयंसेवक के विचारों से समानता प्रदर्शित कर भी सकते हैं और नहीं भी।

भले ही मैंने अपनी किताब की शुरुआत में ही यह डिसक्लेमर दिया है लेकिन मैं यहाँ इसे और अधिक विस्तारित रूप में प्रस्तुत करना चाहूँगा और साथ ही आरएसएस पर अपने विचारों को भी।

सबसे पहले तो यह कि अपनी विचारधारात्मक पहचान के प्रति सुदृढ़ रहने के बाद भी अभी तक (अगस्त 2020 में अपनी किताब का काम पूरा करने तक) मैं किसी भी शाखा में शामिल नहीं हुआ हूँ। मुझे अभी भी इसकी कोई जानकारी नहीं है कि एक आरएसएस सदस्य की शाखा के अंदर और बाहर (दैनिक या साप्ताहिक) क्या गतिविधियाँ होती हैं।

हाँ इतना जरूर है कि मैं आरएसएस और उसके विचारों को समझने के लिए आरएसएस सदस्यों के कुछ एकत्रीकरण में शामिल हुआ। ईमानदारी से कहूँ तो मैं यह नहीं कह सकता कि मैं हमेशा ही उनसे सहमत हूँ और निश्चित तौर पर आरएसएस भी कभी यह अपेक्षा नहीं करता कि सभी उससे सहमत हों।

मेरे सीमित आकलन के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि आरएसएस पर्याप्त रूप से ‘संघी’ नहीं है। यहाँ मैं उसी ‘संघी’ भाव की बात कर रहा हूँ जो अक्सर उसके समर्थक और विरोधियों के द्वारा एक नैरेटिव के तहत उपयोग में लाया जाता है।

मैं जितने भी वरिष्ठ आरएसएस सदस्यों से मिला उनमें वह आक्रामकता और जुझारूपन नहीं था जिसकी एक संघी में कल्पना की जाती है। उनमें से अधिकांश के अंदर समस्याओं के समाधान के लिए एक धैर्य और प्रेरक दृष्टिकोण देखा गया।

मैं अपने अनुमान में गलत हो सकता हूँ लेकिन मुझे नहीं लगता कि आरएसएस किसी भी तरीके से समाज अथवा राजनीति में आमूलचूल परिवर्तन करने में भरोसा करता है। उनका मानना है कि परिवर्तन धीरे-धीरे हो और बिना किसी को आहत किए।

यदि कोई आरएसएस को एक हिन्दू कट्टरपंथी संगठन के रूप में प्रचारित करता है तो यह हर सीमा तक गलत ही होगा। दुर्भाग्य से आरएसएस को इसी तरह प्रचारित किया जाता है। मैं कई ऐसे आरएसएस के सदस्यों को जानता हूँ जिन्होंने सिर्फ इसी कारण से आरएसएस को छोड़ दिया क्योंकि उन्हें लगता है कि आरएसएस बदलाव लाने के प्रति कुछ ज्यादा ही नरम है।

यह सही है कि कई अन्य संगठनों जैसे विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के सदस्य आरएसएस के सदस्य भी हो सकते हैं लेकिन तकनीकी तौर पर वे ‘आरएसएस से सम्बद्ध’ संगठन नहीं हैं। जहाँ एक ओर ये संगठन आक्रामक माने जाते हैं, आरएसएस व्यक्ति निर्माण और सामाजिक समरसता की बात करता है। वास्तव में सच तो यह है कि आरएसएस एक्सक्लूसिव तौर पर सिर्फ हिन्दू समाज के बारे में बात नहीं करता।

बस यही वह एक बिन्दु है जहाँ अक्सर आरएसएस को शाखा न जाने वालों से आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है। हालाँकि, मैं इन आलोचनाओं का पूर्ण रूप से समर्थन नहीं करता हूँ लेकिन आरएसएस और उसके शीर्ष नेतृत्व की एक सामान्य आलोचना हमेशा से होती रही है कि उनकी प्राथमिकताएँ सही नहीं हैं और वे हिन्दू समाज की ओर बढ़ रहे खतरे को नहीं देख पा रहे हैं। जब केरल या बंगाल में किसी आरएसएस सदस्य की हत्या होती है तो यह ‘संघी’ अक्सर नाराज होते हैं कि आरएसएस का नेतृत्व अपने ही लोगों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाता है।

भारत में पैदा हुए सभी लोगों को उनके पंथ और मजहब के बावजूद हिन्दू मानने का विचार या बयान, जो कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से भी सुना गया, इस बात का प्रमाण है कि आरएसएस के भीतर ही वैचारिक उलझन है जिसके कारण आरएसएस हिन्दू समाज की ओर बढ़ रहे खतरे को भाँपने में असमर्थ रह जाता है।

उदाहरण के लिए 2019 में दशहरा के अवसर पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था, “जो भारत के हैं, जो भारतीय पूर्वजों के वंशज हैं, जो राष्ट्र के गौरव के लिए कार्य कर रहे हैं, सभी तरह की अखंडता का सम्मान करते हैं, वो सभी भारतीय हिन्दू हैं।”

हालाँकि, 2012 से पहले मैं ऐसी बातों से प्रभावित होता लेकिन फिर भी संघी कहे जाने पर मैं इसे ‘चरित्र हनन’ के तौर पर ही मानता। मैं पूर्ण रूप से व्यावहारिक आदमी हूँ, आदर्शवादी नहीं। तो इसलिए मुझे नहीं पता कि ऐसे समावेशी बयानों का क्या मतलब निकलता है? और ऐसे समाधानकारी या मेल-मिलाप वाले बयान से किस उद्देश्य की पूर्ति होती है?

किसी भी सीमा तक भारत में रहने वाले या पैदा हुए सभी लोगों को हिन्दू के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। मैं निजी तौर पर भारतीयों को हिन्दुत्व के प्रति उनके रवैये के आधार पर 5 विभिन्न वर्गों में विभाजित करना चाहूँगा,

प्रतिरोधी : पहले वो हैं जो हिन्दुत्व के सख्त विरोधी हैं और इसे समाप्त करने की इच्छा रखते हैं। वो पेरियारवादियों, नियो-अम्बेडकरवादियों, इस्लामिस्ट और इंजीलवादियों की तरह हिन्दुत्व और हिन्दूइज्म में कोई भेद नहीं करते। वो सीधे तौर पर इस पहचान को समाप्त कर देना चाहते हैं। वो या तो हिन्दू धर्म को या तो संकीर्ण या आधारभूत तौर पर निम्न विचारधारा के रूप में देखते हैं और इसे समाप्त करने के योग्य समझते हैं।

कृपालु अथवा दयावान : इस वर्ग में ऐसे लोग आते हैं जो हिन्दुत्व या हिन्दूइज्म, दोनों के ही खिलाफ पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं लेकिन कई कारणों से इसे स्वीकार करते हैं। अधिकांश लिबरल इसी वर्ग में आते हैं। ये हिन्दू धर्म को तभी स्वीकार करेंगे जब वह उनके अनुसार होगा। उदाहरण के लिए जब सभी हिन्दू त्यौहार या तो विनियमित होंगे या धर्मनिरपेक्षित, जैसे कि ओणम जो कि ‘फसलों का त्यौहार है और इसका हिन्दू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।’

उदासीन : ये ऐसे लोग हैं जो हिन्दुत्व या हिन्दू धर्म (हिन्दूइज्म) के प्रति उदासीन हैं। इस वर्ग में वो लोग आते हैं जो या तो चुनौतियों से अनजान हैं या अपने जीवन में ही पूरी तरह से व्यस्त हैं। कॉन्ग्रेसी हिन्दू इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। इनके बारे में मैंने अपनी किताब में बताया था। हालाँकि, इनकी विचारशीलता ऊपर बताए गए दो समूहों से प्रेरित होती है, बजाए उनके जिनके बारे में आगे बताया जाएगा। कई गैर-हिन्दू भी इसी श्रेणी में आते हैं।

सहायक : ये ऐसे लोग हैं जो अपनी हिन्दू पहचान से वाकिफ हैं और हिन्दू कारणों का समर्थन करते हैं। ये मुखर हो भी सकते हैं और नहीं भी लेकिन ये उदासीन तो नहीं हैं। कई स्व-घोषित संघी (वास्तविक संघी नहीं) या तो इस वर्ग में आते हैं या अगले। आरएसएस प्रमुख के बयान के अनुसार कई गैर-हिन्दू भी इसी वर्ग में आते हैं। हालाँकि, मैं इसकी आशा करता हूँ किन्तु इसके विषय में निश्चित नहीं हूँ।

मुखर : इस समूह में ऐसे लोग हैं जो न केवल अपनी पहचान के प्रति जागरूक हैं बल्कि इसके लिए कड़े कदम उठाने के लिए तैयार रहते हैं। ये अपनी इस पहचान की सुरक्षा के लिए खतरा भी मोल ले सकते हैं। हालाँकि, यह एक संपूर्ण समूह नहीं है और इसके क्रियाकलाप कई उप-समूहों में अलग-अलग भी हो सकते हैं।

मेरे विचार में आरएसएस को अंतिम दो समूहों को नेतृत्व और स्पष्टता प्रदान करनी चाहिए और तीसरे समूह (उदासीन) को बदलने का प्रयास करना चाहिए। कृपालु अथवा दयावान समूह के लोगों से बात की जा सकती है लेकिन अपनी शर्तों पर। ऐसा करके पहले समूह को बिना किसी मेल-मिलाप के हराया जा सकता है।

मैं निजी तौर पर हिंदुओं के भविष्य को लेकर चिंतित हूँ। मुझे यह लगता है कि प्रतिरोधी और कृपालु समूह मिलकर भारत की जनसंख्या का लगभग 30% हैं और यह शीघ्र ही एक टिपिंग पॉइंट में बदल सकते हैं। इसके अलावा जैसा कि मैंने अपनी किताब में एक जगह उल्लेखित किया है कि मैं वर्तमान घटनाओं और भारत विभाजन के साथ उत्पन्न हुई परिस्थितियों में एक भयानक समानता देख पा रहा हूँ। मैं इतिहास को खुद को दोहराते हुए देखता हूँ जब तक कि हिन्दू जाग नहीं जाते।

अब हिन्दूफोबिया का भी एक चिंताजनक स्तर तक सामान्यीकरण और बुद्धिजीविकरण हो रहा है। यह एक ऐसा स्तर है जहाँ यदि कोई हिन्दू अपने साथ हुए अन्याय की बात करता है तो उसे धर्मांध कह दिया जाता है। जो कुछ भी हिन्दू धर्म के प्रचार से संबंधित है अथवा उसके उत्सव स्वरूप को प्रदर्शित करता है, उसे एक सुरक्षित वातावरण के लिए हानिकारक माना जाता है। यह भारत और यहाँ तक कि विदेशों में भी शुरू हो चुका है जिसका ताना-बाना ब्राह्मणवाद के विरोध में बुना जा रहा है।

मैं इस बात के लिए कितना चिंतित हूँ इसका पता इसी बात से चलता है कि मुझे लगता है हिंदुओं के औपचारिक संहार के लिए उन्हें खिलाया-पिलाया जा रहा है। यदि उन्हें वास्तविकता से परिचित करने का कोई भी प्रयास किया जाता है या उन्हें सभ्यतागत खतरों से सतर्क किया जाता है तो उसे ‘वास्तविकता मुद्दों से भटकाने के प्रयास’ के रूप में देखा जाता है।

मेरी यह चिंता उचित हो भी सकती है अथवा नहीं लेकिन इसके कारण मुझे यह लगता है कि हिंदुओं को एक सामुदायिक नेतृत्व की आवश्यकता है जो उन्हें आगामी खतरों के बारे में स्पष्ट और तार्किक रूप से समझा सके। यह जल्दी किया जाना चाहिए, इससे पहले कि मेरी तरह कई और लोग आतुर हो जाएँ। हालाँकि, मैं वास्तव में इस चिंता से खुश नहीं हूँ।

और मैं यह मानता हूँ कि आरएसएस इसके लिए सही संगठन है क्योंकि उसका आकार और उसकी विरासत उसे इस योग्य बनाती है। लेकिन आरएसएस एक हिन्दू संगठन बनने के स्थान पर एक राष्ट्रवादी संगठन बनने के प्रयास में लगा हुआ है जो चरित्र निर्माण पर केंद्रित है। यही वह बिन्दु है जहाँ मैं नाखुश हूँ।

दरअसल मैनें जो खा है वह किसी भी प्रकार से आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के वक्तव्य से अलग नहीं है। यहाँ प्रस्तुत वक्तव्य डॉ. हेडगेवार के द्वारा दिया गया था जो आरएसएस की दूरदृष्टा और लक्ष्य के बारे में है और आरएसएस की वेबसाइट पर बताया गया है,

“हिन्दू संस्कृति हिन्दुस्थान की प्राण-वायु है। अतः स्पष्ट है कि यदि हिन्दुस्थान की रक्षा करनी है तो पहले हमें हिन्दू संस्कृति का पोषण करना चाहिए। यदि हिन्दुस्थान में ही हिन्दू संस्कृति का नाश हो जाता है, और यदि हिन्दू समाज का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, तो हिन्दुस्थान के रूप में बनी हुई केवल भौगोलिक इकाई का उल्लेख करना शायद ही उचित होगा। केवल भौगोलिक सीमाएँ ही राष्ट्र नहीं बनातीं। पूरे समाज को ऐसी सतर्क और संगठित स्थिति में होना चाहिए कि कोई भी हमारे सम्मान के किसी भी बिंदु पर बुरी नजर डालने की हिम्मत न करे। यह याद रखना चाहिए कि ताकत संगठन से ही आती है। इसलिए प्रत्येक हिंदू का कर्तव्य है कि वह हिंदू समाज को मजबूत करने के लिए हर संभव प्रयास करे।”

तो, क्या आरएसएस अपना रास्ता भटक गया है या मेरे जैसे स्वघोषित संघी यह नहीं देख पा रहे हैं कि संगठन अभी भी ट्रैक पर है और अपने संस्थापक के दृष्टिकोण का पालन कर रहा है। मुझे इसका जवाब चाहिए।

अंग्रेजी में मूल रूप से इस लेख को इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है। इसका हिंदी अनुवाद ओम द्विवेदी ने किया है।

राहुल रौशन द्वारा लिखित पुस्तक ‘Sanghi Who Never Went To A Shakha’, रूपा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई थी और 10 मार्च 2021 को जारी हुई थी। इस लिंक का उपयोग करके पुस्तक को खरीद सकते हैं।

Updated: September 30, 2021 — 8:07 pm

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