खास रपटः महज नाम की योजना

जब वाई वाई नूडल्स के निर्माता, नेपाल स्थित सीजी कॉर्प ग्लोबल के कार्यकारी निदेशक वरुण चौधरी ने भारत में फूड पार्क बनाने के लिए आवेदन किया, तो इसी उम्मीद में थे कि यह तो बस उस काम को थोड़ा और विस्तार देने जैसा ही होगा जो उनकी कंपनी पहले से करती आ रही है.

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के इस बड़े खिलाड़ी का भारत में एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर प्रोडक्ट्स या तेजी से बिकने वाली उपभोक्ता वस्तुएं) से लेकर आतिथ्य क्षेत्र में 13,000 करोड़ रुपए का कारोबार है. समूह की एफएमसीजी शाखा का काम देखने वाले चौधरी का कहना है कि आवेदन के बाद जिस जटिल प्रक्रिया और सख्त प्रावधानों से उनका सामना हुआ, वह बेहद चुनौतीपूर्ण था. 

वैसे, सरकार को लगता है कि देश में फूड पार्क स्थापित करने के खातिर निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए उसने अपनी ओर से काफी प्रयास किए हैं—मसलन, कुछ शर्तों को पूरा करने वाले कारोबार को अनुदान के रूप में 50 करोड़ रुपए नकद सब्सिडी दी जाती है.

प्रिस्टीन फूड्स के सीईओ आनंद झा इसे जरूरी प्रोत्साहनों की दिशा में सरकार की ‘अच्छी पहल’ तो मानते हैं लेकिन यह पर्याप्त नहीं. इस उद्योग को बढ़ावा देने की सरकार की सारी कोशिशें परियोजना के आवंटन, भूमि अधिग्रहण, जटिल प्रावधानों, खराब मार्केटिंग और राज्य सरकारों की भागीदारी की कमी के कारण बेपटरी हो जाती हैं.

हालांकि भारत खाद्य उत्पादन में दुनिया में सबसे आगे है, लेकिन कुल उत्पादन के सिर्फ छोटे-से हिस्से का ही प्रसंस्करण होता है. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के मार्च 2020 के अनुमान के मुताबिक, यह 10 फीसद से भी कम है. 85,000 करोड़ रुपए का खाद्य प्रसंस्करण उद्योग लगभग 39,748 पंजीकृत इकाइयों के साथ 17.7 लाख लोगों को रोजगार देता है और जिसमें कुल उत्पादन 158 अरब डॉलर (11.5 लाख करोड़ रुपए) मूल्य का होता है. इन्वेस्ट इंडिया के एक आकलन में कहा गया है कि यह उद्योग 2025 तक 500 अरब डॉलर (36.6 लाख करोड़ रुपए) तक बढ़ सकता है.

रोजगार का लेखा-जोखा

निवेश को बढ़ावा देने के लिए, सरकार ने अपनी मेगा फूड पार्क (एमएफपी) योजना के तहत 37 फूड पार्कों को मंजूरी दी है, जिसमें 21 में काम शुरू हो चुका है और 16 पर अभी काम चल रहा है. 5 फरवरी को राज्यसभा में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्यमंत्री रामेश्वर तेली ने बताया कि सरकार ”खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने के लिए एमएफपी योजना पर अमल कर रही है.’’

हालांकि, केवल एक—हरिद्वार में पतंजलि का एमएफपी—ही सफल दिखता है. सरकार ने अनुमान लगाया था कि हर पार्क में 250 करोड़ रुपए के कुल निवेश और 450-500 करोड़ रुपए के वार्षिक कारोबार के साथ 25-30 इकाइयां होंगी जिनसे 5,000 प्रत्यक्ष और ऌपरोक्ष रोजगार सृजन होगा और 25,000 किसानों को लाभ होगा. हालांकि, अधिकांश एमएफपी में शून्य से आठ इकाइयां ही हैं.

देश में फूड पार्क योजना पहली बार 1992-93 में शुरू की गई थी. तब, ऐसी परियोजनाओं की जिक्वमेदारी राज्य सरकारों की थी और औद्योगिक क्षेत्र का दर्जा दिया गया था लेकिन उत्पादन के लिए आवश्यक सुविधाओं (कच्चे माल, परिवहन, वगैरह) की व्यवस्था समुचित नहीं थी. 2007-08 में केंद्र सरकार ने एमएफपी योजना की घोषणा की. सरकार को उम्मीद थी कि निजी क्षेत्र एमएफपी में आगे आएगा.

इसके लिए आवश्यक कोल्ड स्टोरेज इकाइयों, गोदामों और पैकेजिंग सुविधाओं जैसे बुनियादी ढांचों को विकसित किया जाएगा, जिसे किसानों, छोटे निर्माताओं और स्थानीय उद्यमियों को पट्टे पर दिया जा सकेगा. योजना का उद्देश्य खेतों से बाजारों तक मूल्य शृंखला विकसित करने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे का निर्माण करना था. सितंबर 2020 में, यह योजना केंद्र की प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना का हिस्सा बना दी गई. इन पार्कों को रोजगार पैदा करने और किसानों की आय बढ़ाने के तरीके के रूप में प्रचारित किया गया.

एमएफपी योजना के तहत, इन पार्कों के निष्पादन, प्रबंधन और निगरानी के लिए कंपनी अधिनियम के तहत पंजीकृत स्पेशल पर्पस व्हीकल या विशेष प्रयोजन साधन (एसपीवी, वित्तीय/संगठनात्मक ढांचा) आवश्यक है. केंद्रीय एजेंसियों को इन एसपीवी में 26 प्रतिशत तक हिस्सेदारी रखने की अनुमति है, शेष हिस्सेदारी निजी क्षेत्र के प्रमोटरों के पास होगी. इन एसपीवी की कुछ शर्तें तय की गई हैं.

उनमें न्यूनतम मूल्यांकन—एसपीवी शेयरधारकों की कुल संपत्ति 50 करोड़ रुपए से कम नहीं होनी चाहिए—और एसपीवी में मुख्य निवेशक को 10 करोड़ रुपए के न्यूनतम निवेश के साथ पार्क में कम से कम एक प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करना और इसका प्रबंधन करना, शामिल हैं. योजना के तहत, केंद्र परियोजना लागत का 50 प्रतिशत, जो कि 50 करोड़ रुपए तक हो सकता है, प्रदान करता है.

एमएफपी योजना शुरू होने के 13 वर्षों में, केवल 22 पार्क चालू हो पाए हैं. बदतर तो यह है, जैसा कि कृषि व्यवसाय सलाहकार तथा वजीर एडवाइजर्स के पार्टनर ऋत्विक बहुगुणा कहते हैं, केवल एक पार्क ही लाभ कमा सका.

सच तो यह है कि इस योजना ने बहुत कम कॉर्पोरेट को आकर्षित किया है, और जो आए वे अब जूझ कर रहे हैं. एक समस्या यह है कि इन पार्कों को कैसे स्थापित किया जाए और कैसे चलाया जाए, इसको लेकर नियम बहुत ज्यादा अस्पष्ट है लेकिन, बिना इनके अनुपालन के अनुदान नहीं मिल सकता. इन वजहों से पेप्सिको जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां पीछे हट गई हैं, जो अपने स्वयं के मॉडल से अन्य देशों में सफलतापूर्वक फूड पार्कों का संचालन कर रही हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि विशिष्ट सेटअप पर जोर देने का नुक्सान हुआ है. कुछ मामलों में, तो निवेशक दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गए हैं, जबकि कई अन्य का दावा है कि उन्होंने इनमें 100 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए हैं, लेकिन उन्हें इन पार्कों में इकाइयों को लीज पर लेने के इच्छुक कोई नहीं मिल पा रहे हैं.

एक समस्या यह है कि निवेशकों को एमएफपी योजना के तहत पार्क स्थापित करने के लिए शुरुआत में तीन या चार अन्य भागीदारों की आवश्यकता थी. विभिन्न जिम्मेदारियों के लिए जवाबदेही तय करने की कठिनाइयों के साथ-साथ प्रबंधन से जुड़ी समस्याओं का हवाला देते हुए, कॉर्पोरेट हमेशा साझेदारी के लिए उत्सुक नहीं होते हैं. (हालांकि बाद में नियमों में संशोधन के बाद इस आवश्यकता को खत्म कर दिया गया—एकल संस्था को अब एसपीवी बनाने की अनुमति है.)

एक और नीति जो एसपीवी के लिए परेशानियां खड़ी करती है वह यह है कि एसपीवी में कम से कम एक निवेशक की पृष्ठभूमि खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की हो और साथ-साथ 50 एकड़ जमीन भी हो. जमीन की आवश्यकता के नियम के साथ अपनी अलग दिक्कतें हैं. मसलन, भूमि को औद्योगिक उपयोग के लिए करवाने में कई अनुमति लेनी पड़ती है.

एक और समस्या उन शर्तों की भी है, जो सब्सिडी के लिए आवश्यक हैं. हालांकि उन सभी का एक औचित्य है, ताकि धन के दुरुपयोग को रोका जा सके, लेकिन प्रक्रिया इतनी जटिल है कि मनोबल टूट जाता है. गुजरात एग्रो इन्फ्रास्ट्रक्चर मेगा फूड पार्क के निदेशक प्रणव दोशी बताते हैं कि अनुदान कई किस्तों में जारी किया जाता है, और प्रत्येक के लिए एक लक्ष्य पूरा करने की आवश्यकता होती है.

मसलन, दूसरी किस्त तभी जारी होगी, जब पार्क में लगभग 60 प्रतिशत सुविधाएं लीज (पट्टे) पर दी जा चुकी हों. इसका मतलब है कि निवेशकों को इसे स्थापित करने के चरण में बड़ी रकम चुकानी होगी—और कई लोगों का कहना है कि उन्हें कुल निवेश का 50 फीसद सिर्फ सड़कों के निर्माण और अपने पार्कों के लिए बिजली प्राप्त करने के लिए खर्च करना पड़ गया है. चौथी और पांचवीं किस्त परियोजना के पूरा होने और काम शुरू होने के बाद ही जारी की जाती है. इसके लिए सरकारी विभागों से अनुमोदन और अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी कराना होता है, और इसमें भी काफी देरी होने की आशंका बनी रहती है.

मसलन, दिसंबर 2019 में, सुखजीत मेगा फूड पार्क और इन्फ्रा लिमिटेड ने खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय से अपील की कि अनुदान की तीसरी किस्त के लिए 40 प्रतिशत निर्माण पूरा करने की शर्त में छूट दे. देरी का एक कारण नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के एक आदेश के कारण केंद्रीय भूजल प्राधिकरण से लंबित अनापत्ति प्रमाण पत्र था. उद्योग के खिलाडिय़ों का कहना है कि विभिन्न सरकारी विभागों से जितनी मंजूरी की आवश्यकता होती है उसे देखते हुए किसी परियोजना को पूरा करने के लिए तय की गई चार से पांच साल की समय-सीमा अवास्तविक है.

दोशी कहते हैं, ”मुझे 2013 में अपनी जमीन मिली. मैं अभी भी मंजूरी हासिल करने की कोशिश में लगा हूं. (मसलन) मैं केंद्रीय भूजल प्राधिकरण से अनुमति की प्रतीक्षा कर रहा हूं. हमने प्रति दिन 14 लाख लीटर पानी निकालने की अनुमति मांगी लेकिन आज, जरूरत 2,00,000 लीटर की है. मैं अनुमोदन के लिए कह रहा हूं (यह मानकर कि) सभी इकाइयां लीज पर उठ चुकी हैं, लेकिन (उससे पहले) मुझे पूरे उपयोग के लिए पैसा जमा करना होगा. छह साल पहले भुगतान में कौन सक्षम होगा?’’

दूसरी दिक्कत परियोजना आवंटन में पारदर्शिता की कमी का है. अमेठी में शक्तिमान पार्क (जिसे बाद में रद्द कर दिया गया) और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के निर्वाचन क्षेत्र जंगीपुर के फूड पार्क का उदाहरण देकर उद्योग के लोगों और विश्लेषकों का कहना है कि एमएफपी के लिए पहले दौर की मंजूरी राजनैतिक वजहों से दी गई थी. बहुगुणा कहते हैं, ‘‘पहले चरण के सभी आवंटन गलत थे, और उनमें अधिकांश प्रोजेक्ट बहुत खराब स्थिति में हैं.

कुछ को रद्द किया जा चुका है; अन्य के पास 10 साल बाद भी दिखाने के लिए कुछ नहीं है.’’ उच्च कर भी एक अन्य बड़ी समस्या है. जीएसटी के तहत अभी भी एक यूनिट को लीज पर देने पर 15-18 प्रतिशत कर लगाया जाता है, जो व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा में कमजोर कर देता है.

हालांकि खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय ने जनवरी में एक अहम कदम उठाया कि फूड पार्कों में इकाइयां लीज पर देने के बजाए बेची जा सकेंगी. प्रिस्टीन फूड्स के झा का कहना है कि यह गेम चेंजर हो सकता है क्योंकि लोग लीज लेने के बजाए पर अपने कारखाने रखना चाहते हैं. उनका कहना है कि बिहार के खगडिय़ा जिले में उनके पार्क में केवल एक कारखाना चालू है और काम शुरू होने के करीब पांच साल लगे हैं. 

ऐसे कारोबारियों के लिए तीन बड़ी समस्याएं जमीन, श्रम और पूंजी से जुड़ी हैं. जमीन हासिल करना तो खासा मुश्किल मुद्दा है. योजना के तहत काम शुरू करने के लिए कम से कम 50 एकड़ जमीन चाहिए. चौधरी के पास रूपनगढ़ में अपने पार्क के लिए जमीन थी, जबकि झा को बिहार औद्योगिक विकास प्राधिकरण (बीआइडीए) से जमीन खरीदनी पड़ी.

हालांकि, इससे समस्या सुलझ नहीं गई, क्योंकि जमीन बीआइडीए की तो थी, लेकिन उसके कब्जे में नहीं थी. जब प्रिस्टीन फूड्स के लोग काम शुरू करने के लिए पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि जमीन पर किसान खेती करते  हैं—और झा कहते हैं कि कब्जा हासिल करना एक दर्दनाक और कठिन प्रक्रिया थी.

पूंजी का प्रबंध एक और बड़ी समस्या है. कई खिलाडिय़ों का कहना है कि पूंजी की कमी के कारण परियोजनाएं अटकी हुई हैं. परियोजनाओं में देरी से बचने के लिए, सरकार ने अब एसपीवी के तहत काम शुरू करने की मंजूरी देने से पहले एक टर्म लोन का इंतजाम करना अनिवार्य कर दिया है. हालांकि, इसके कारण अलग तरह की चुनौतियां सामने आ खड़ी होती हैं—क्योंकि ऋण प्राप्त करने के लिए यह साबित करना होता है कि जिस व्यापार के लिए ऋण लिया जा रहा है, वह व्यवहारिक है. इसलिए फंडिंग तक पहुंच की मुश्किल वैसी ही बनी हुई है.

स्थान भी महत्वपूर्ण है. मसलन, दोशी का पार्क सूरत से लगभग 50 किमी दूर है और इसलिए सहकारी समितियों और स्थानीय कारोबार तक उसकी अच्छी पहुंच है. (हालांकि यह सफलता की कोई गारंटी नहीं है, फिर भी उनकी परियोजना ऋण चुकाने में सक्षम है, लेकिन मुनाफा नहीं हो रहा) ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित पार्कों की स्थिति बहुत खराब है.

खराब बुनियादी ढांचा और कच्चे माल और मजदूरों की दिक्कतें उत्पादन की लागत बढ़ाते हैं और इससे प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है.इन्हीं वजहों से रांची का एक पार्क एनपीए (गैर-निष्पादित परिसंपत्ति) बन गया है. पंजाब का एक पार्क बनकर तैयार है मगर उसे बंद करने के लिए एनसीएलटी (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) में जाना पड़ा है.

एमएफपी योजना की इकलौती कामयाब कहानी पतंजलि हर्बल फूड पार्क की वजह यह है कि इसके भीतर विकसित सभी बुनियादी ढांचा इकाइयां पतंजलि एफएमसीजी कारोबार को ही लीज पर दी गई हैं. दूसरे अपने स्वयं के व्यापार के संचालन के लिए ऐसे बड़े बुनियादी ढांचे का उपयोग शायद ही कर सकते हैं.

अधिकांश फूड पार्क कच्चे माल और मजदूरों तक पहुंच बनाने के लिए बुनियादी ढांचे का विकास से लेकर संबंधित उद्योगों के साथ संपर्क साधने तक, सारा काम अपने आप करते हैं. डेवेलपर्स का कहना है कि उन्हें अपने प्रयास के अनुरूप फायदा नहीं मिलता है. एक अन्य समस्या यह है कि खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में छोटे निर्माताओं का वर्चस्व है, जो सस्ती उत्पादन सुविधाओं पर जोर देते हैं. फूड पार्क में इकाई किराये पर लेना अपेक्षाकृत महंगा होता है क्योंकि उसके लिए बुनियादी ढांचे को स्थापित करने में डेवलपर ने भारी निवेश किया होता है.

कई डेवलपर तो ऐसे हैं, जिन्होंने इस क्षेत्र के उद्योगों की जरूरतें और चुनौतियों को पहचानने के लिए आवश्यक अनुभव या समझ के बिना एमएफपी योजना के तहत फूड पार्कों का निर्माण किया है, और वे छोटे निर्माताओं को आकर्षित करने में जुटे हैं जिन्हें अन्य जगहों पर सस्ता विकल्प मिल जाता है. इन सुविधाओं की मार्केटिंग एक और समस्या है—यहां तक कि चौधरी जैसे अनुभवी एफएमसीजी खिलाडिय़ों को इन इकाइयों को लीज पर देने के लिए अपने व्यक्तिगत संपर्कों पर आश्रित होना पड़ा रहा है.

बहुगुणा सुझाव देते हैं कि फूड पार्क डेवलपर अपनी पहुंच अधिकतम बनाने के लिए डिजिटल मार्केटिंग में निवेश करें और सरकार इन पार्कों को बढ़ावा दे. वे कहते हैं, ”सभी फूड पार्कों की वेबसाइट होनी चाहिए और मंत्रालय उनकी मदद आश्वस्त करे. अधिकांश फूड पार्कों की मार्केटिंग की कोशिशें मात्र कुछ सौ किलोमीटर तक ही सीमित रहती हैं—मंत्रालय के पास इन पार्कों की जानकारी वैश्विक खिलाडिय़ों तक पहुंचाने की क्षमता है.’’

चुनौती तब और अधिक जटिल हो जाती है जब कोई समझता है कि विभिन्न प्रकार के फूड पार्क—जो सीफूड या पोल्ट्री, फूडग्रेन या फलों के लिए सुविधाओं में विशेषज्ञता रखते हैं—का बुनियादी ढांचा अलग तरह का होगा, और इसलिए विभिन्न प्रकार के भावी ग्राहकों के बीच उनके प्रचार की आवश्यकता है.

कुछ का ऐसा भी मानना है कि राज्य सरकारों को बड़ी भूमिका निभानी चाहिए. झा कहते हैं, ‘‘राज्यों को पार्कों के समर्थन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए कदम उठाने होंगे.’’ सीमित अवधि के लिए स्टांप शुल्क या राज्य जीएसटी की छूट जैसे कर प्रोत्साहन दिए जा सकते हैं.

बढिय़ा मार्केटिंग से इकाइयों को लीज पर लेने में भी मदद मिलेगी. खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय इस संबंध में अपनी नीतियों को बदल रहा है, और परियोजना के सभी चरणों में कार्यान्वयन को मंजूरी देने से अधिक सरकारी भागीदारी तय करने पर काम कर रहा है. एक अच्छा समाधान यह हो सकता है कि एसपीवी में एक सरकारी प्रतिनिधि हो, जो इन इकाइयों के सामने आने वाली प्रक्रियागत बाधाओं को दूर करने में मदद करे.

फिलहाल, कई एमएफपी का भविष्य अधर में दिखता है. कई को बंद करने के लिए एनसीएलटी की शरण में जाना पड़ सकता है. जो बच जाएंगे, उन्हें बहुत मदद की आवश्यकता होगी. इस योजना को अब प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना के साथ जोड़ दिए जाने के कारण, सफलता तय करने के लिए सरकार को वित्तीय प्रोत्साहन से आगे बढ़कर सोचना होगा.

इसमें लाइसेंस प्रदान करने में अधिक तेजी, पूरी हो चुकी परियोजनाओं की मार्केटिंग में सहायता, निर्माणाधीन परियोजनाओं की बेहतर निगरानी, कम लालफीताशाही और इसी तरह के कई कार्य शामिल हैं.

एक सकारात्मक बात यह है कि धन संबंधी समस्या को दूर करने के लिए नाबार्ड (राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक) के साथ एक सीड फंड की व्यवस्था की गई है. इस सुविधा का उपयोग करने वाले दोशी कहते हैं, ‘‘नाबार्ड यह आश्वस्त करना चाहता है कि ऋण खराब न हों. इसमें मासिक किस्तें न होकर त्रैमासिक भुगतान योजना के रूप में एक मदद की व्यवस्था दी गई है. यह एक बड़ी राहत है.’’

आइसीआरआइईआर (भारतीय अंतराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद) की एक रिपोर्ट भी इस बात पर प्रकाश डालती है कि विभिन्न निवेशकों की जरूरतें अलग-अलग होती हैं, और खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय को अपनी योजनाओं को उसी हिसाब से लागू करना चाहिए, जो विशिष्ट आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए ‘सबके लिए एक समान व्यवस्था’ के सिद्धांत से इतर हो.

इस तरह की पहल की सफलता अनेक कारणों से आवश्यक है लेकिन यह तभी हो सकता है, अगर सरकार अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं की कामयाबी तय करने के लिए प्रोत्साहन और महज नीतिगत घोषणाओं के आसरे रहने के बजाए आगे बढ़कर सक्रिय रूप से प्रयास करे. दरअसल सिर्फ कागजी हस्तक्षेप से बात नहीं बनेगी. अगर वाकई इस योजना को किसानों की आमदनी बढ़ाने का विकल्प बनाना है तो सरकार को आगे आना होगा.

‘‘सरकार एमएफपी योजना पर अमल के जरिए खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करना चाहती है’’
रामेश्वर तेली, केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्यमंत्री

‘‘मुझे फूड पार्क के कारोबार में काम हासिल करने के लिए अपने व्यक्तिगत नेटवर्क की मदद लेनी पड़ी. मार्केटिंग के मद में मदद महत्वपूर्ण है’’
वरुण चौधरी, एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर, सीजी कॉर्प ग्लोबल

फास्ट फूड आंकड़े
■ भारत खाद्य उत्पादन में दुनिया भर में सबसे आगे
■ फिर भी देश में कुल उत्पादन का 10 फीसद ही प्रसंस्करण के क्षेत्र में आता है
■ खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का कारोबार करीब 85,000 करोड़ रु. का है
■ इसमें 39,748 पंजीकृत इकाइयों में करीब 17.7 लाख लोग रोजगार पाते हैं

मेगा फूड पार्क योजना
■ एमएफपी योजना के तहत सरकार कुल परियोजना लागत का आधा या 50 करोड़ रु. तक अनुदान देती है
■ अनुदान के लिए जमीन और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का अनुभव होना जरूरी है
■ अनुदान कई चरणों में विशेष लक्ष्यों की सफलता हासिल करने के बाद दिया जाता है
■ एमएफपी के तहत खाद्य प्रसंस्करण सुविधाएं विकसित करके उन्हें कंपनियों को पट्टे पर दिया जा सकता है या बेचा जा सकता है

क्यों एमएफपी योजना नाकाम
■ जानकारों के मुताबिक, शुरुआती आवंटन राजनैतिक वजहों से हुई, न कि व्यावसायिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर
■ इन्फ्रास्ट्रक्चर पर फोकस से खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों के बदले रियल एस्टेट वालों ने दिलचस्पी ली
■ एसपीवी में कई सहयोगी होने की शुरुआती शर्त से कॉर्पोरेट दूर रहे
■ सभी परियोजनाओं के लिए एक जैसे दिशानिर्देश से बड़े खिलाड़ी नहीं आए
■ सरकारी मदद के अभाव, एमएफपी इकाइयों की ग्राहकों तक पहुंच और संपर्क असुविधाओं ने दिक्कतें बढ़ाईं.

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