तारा तारिणी मंदिर: प्रथम पूज्य 4 आदि शक्तिपीठों में से एक, शक्ति तंत्र का प्रमुख केंद्र, 999 सीढ़ियों की है चढ़ाई

ओडिशा के गंजम जिले के ब्रह्मपुर शहर में स्थित है तारा तारिणी आदि शक्ति पीठ। विभिन्न पौराणिक मान्यताओं के आधार पर माना जाता है कि भारत और उसके आस-पास के क्षेत्रों में 51 अथवा 52 शक्तिपीठ हैं, लेकिन 4 ऐसे स्थान हैं, जिन्हें आदि शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है। तारा तारिणी मंदिर उन्हीं आदि शक्ति पीठों में से एक है, जिसे ‘स्तन पीठ’ के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यहाँ माता सती के दोनों स्तन, ऋषिकुल्या नदी के किनारे स्थित कुमारी पहाड़ी पर गिरे थे। तारा तारिणी मंदिर को शाक्त संप्रदाय के उन प्रमुख स्थानों के रूप में जाना जाता है, जहाँ तंत्र विद्या का प्राचीन इतिहास रहा है।

मंदिर का पौराणिक इतिहास

शिव पुराण, देवी भागवत पुराण, कालिका पुराण, अष्टशक्ति और पीठनिर्णय तंत्र में तारा तारिणी समेत 4 आदि शक्तिपीठों का वर्णन किया गया है। महाराज दक्ष के द्वारा अपमान किए जाने के बाद जब माता सती ने अपने प्राण त्याग दिए तो भगवान शिव उनकी मृत देह को लेकर भयंकर क्रोध में आ गए। उनके क्रोध को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती की मृत देह को कई भागों में विभक्त कर दिया। इस दौरान माता सती के दोनों स्तन इसी स्थान पर गिरे, जहाँ स्थापित हुए तारा तारिणी मंदिर। मंदिर में दो जुड़वा देवियों तारा और तारिणी की पूजा होती है।

कई मान्यताओं के अनुसार यह भी माना जाता है कि मंदिर की मुख्य देवियाँ तारा और तारिणी कुछ समय के लिए मानव रूप में अपने भक्तों के बीच रहीं। उन्होंने अपने भक्तों के बीच रहते हुए कई चमत्कार किए, जिससे लोगों को उनकी शक्ति का आभाष हुआ। इसके बाद से कुमारी पहाड़ी पर तारा तारिणी मंदिर अस्तित्व में आया। आज ओडिशा के अंदर लगभग सभी इलाकों में माता तारा और तारिणी को इष्ट देवी के रूप में पूजा जाता है और ओडिशा के निवासियों के घरों में तारा और तारिणी की मूर्तियाँ और तस्वीरें मिल जाएँगी।

मंदिर का निर्माण और आदि शक्तिपीठ क्षेत्र

ब्रह्मपुर शहर के उत्तर में 30 किलोमीटर (किमी) की दूरी पर स्थित तारा तारिणी आदि शक्तिपीठ में दो अत्यंत प्राचीन पत्थर की प्रतिमाएँ हैं, जो देवी तारा और तारिणी का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन प्रतिमाओं को स्वर्ण और चाँदी के आभूषणों से सुसज्जित किया गया है। इसके अलावा इन दो प्रतिमाओं के बीच में पीतल के दो मुख स्थित हैं, जिन्हें जीवंत प्रतिमा के रूप में जाना जाता है। तारा तारिणी आदि शक्तिपीठ शक्ति तंत्र का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहाँ तक कि इस स्थान पर बौद्धों के द्वारा तांत्रिक प्रक्रियाओं को सम्पन्न करने के प्रमाण भी मिलते हैं।

तारा तारिणी मंदिर का निर्माण कलिंग वास्तुकला के अनुसार हुआ है। कुमारी पहाड़ी के ऊपर स्थित यह मंदिर पूर्णतः पत्थरों का उपयोग करके बनाया गया है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कलिंग राजाओं द्वारा प्राचीन काल में कराया गया। मंदिर जिस पहाड़ी पर स्थित है, उसकी ऊँचाई 708 फुट है, जहाँ यह आदि शक्तिपीठ क्षेत्र लगभग 180 एकड़ जमीन पर फैला हुआ है। कुमारी पहाड़ी की चोटी तक पहुँचने के लिए 999 सीढ़ियों की चढ़ाई है। इसके अलावा एक पक्की रोड भी पहाड़ी की चोटी पर स्थित मंदिर तक जाती है। हालाँकि सभी पर्वतीय तीर्थ स्थानों की तरह भक्त यहाँ भी सीढ़ियाँ चढ़कर ही जाना पसंद करते हैं।

वैसे तो देवी स्थान होने के करण यहाँ का प्रमुख त्यौहार नवरात्रि है, जो साल में दो बार यहाँ धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन यहाँ का प्रमुख त्यौहार चैत्र पर्व या चैत्र यात्रा को भी माना जाता है। यह त्यौहार चैत्र महीने के प्रत्येक मंगलवार को मनाया जाता है। इसके अलावा हिन्दू नव वर्ष की संक्रांति को भी इस मंदिर में त्यौहार की तरह ही मनाया जाता है।

कैसे पहुँचें?

तारा तारिणी आदि शक्तिपीठ का निकटतम हवाईअड्डा भुवनेश्वर में स्थित है, जो मंदिर क्षेत्र से लगभग 176 किमी की दूरी पर स्थित है। इसके अलावा मंदिर का निकटतम रेलवे स्टेशन ब्रह्मपुर है, जो यहाँ से लगभग 40 किमी की दूरी पर स्थित है।

ब्रह्मपुर, ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से लगभग 170 किमी की दूरी पर है। सड़क मार्ग से भी मंदिर तक पहुँचना काफी आसान है। ब्रह्मपुर के लिए ओडिशा के कई बड़े शहरों से यातायात के सभी प्रकार के साधनों का संचालन होता है। ब्रह्मपुर से स्थानीय परिवहन के साधनों का उपयोग करके तारा तारिणी मंदिर पहुँचा जा सकता है।

Updated: January 3, 2022 — 1:54 am

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