‘भारत ने किया कश्मीर पर कब्जा, इस्लाम ने दिखाई सही राह’: TISS में प्रकाशित हुए कई विवादित पेपर, फण्ड रोकने की माँग

‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS)’ हैदराबाद की एक थीसिस में जम्मू कश्मीर में भड़की हिंसा के लिए भारतीय सेना को जिम्मेदार बताए जाने के बाद अब मामले ने तूल पकड़ लिया है।

थीसिस लिखने वाली अनन्या कुंडू ने लगातार अपने पेपर में कश्मीर क्षेत्र को ‘India occupied Kashmir’ बताया था। जिसके बाद इस थीसिस को लेकर लोग भारत सरकार से गुहार लगाने लगे थे कि संस्थान को फंडिग देनी बंद की जाए।

हालाँकि, जैसे-जैसे मामला दूर तक फैला, ये बात पता चली कि सिर्फ हैदराबाद के TISS में जमा की गई थीसिस में ही ऐसी विवादस्पद बात नहीं लिखी गई है बल्कि TISS के गुवाहटी कैंपस में भी एक ऐसा पेपर जमा हुआ जिसमें इस्लाम को बढ़ावा देने की बातें कही गई हैं और समझाया गया कि कैसे हर परेशानी का हल अल्लाह देते हैं।

स्कॉलर अभिनव प्रकाश ने इस पेपर के कुछ स्क्रीनशॉट शेयर किए हैं। इसे लिखने वाली लेखिका श्रेयसी मुखर्जी हैं। पेपर का टाइटल ‘Poetry of Resistance’ दिया गया है। इस पेपर में लेखिका ने बताया कि कैसे उन्होंने अपने सबजेक्ट के साथ रोमांटिक रिश्ते बना लिए थे और परेशान होने पर वह अल्लाह की शरण में गई थी।

साभार: अभिनव प्रकाश

लेखिका लिखती है, “अपनी फील्ड के लोग, संभवत: सब्जेक्ट के साथ, रोमांटिक रिश्ते बनाना, या यहाँ तक कि उसे दोस्त बनाना, लगभग ईशनिंदा होगी। लेकिन मैं इसके लिए तैयार थी। कश्मीर को क्लिनिकल प्वाइंट ऑफ व्यू से ऑब्जर्व करने से ज्यादा मैंने अपने पार्टनर को ऑब्जर्व करके बहुत सीखा, वह कभी-कभी मेरा सब्जेक्ट भी बना।”

श्रेयसी लिखती हैं, “कुछ चीजों को पढ़कर मैं अक्सर परेशान हो जाती थी और ऐसे क्षणों में मैंने इस्लाम को लेकर दिए गए उपदेश और उस पर छोटे-छोटे लेक्चर्स की शरण ली जिनमें ऐसी बात कही गई जो आज भी मेरे साथ हैं। ये जानकर कि अल्लाह मुझको कभी ऐसी किसी स्थिति में नहीं डालेंगे जहाँ से मेरे लिए निकलना असंभव हो, ये जानकर कि अल्लाह का न्याय हमेशा निष्पक्ष और सच्चा होता है, हमारे संघर्ष के साथ चीजें आसान होती जाती हैं और इसलिए जब भी मैं दुख में होती हूँ तो अल्लाह के शरण में जाना मेरे मन को शांत करता है और साथ ही मुझे एक समझ देता है कि चीजों के होने का उद्देश्य क्या था जो मुझे कहीं और से नहीं पता चलता।”

साभार: अभिनव प्रकाश

अपने पेपर में श्रेयसी आगे लिखती हैं, “और अगर मैं एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसने बार-बार धर्म को मानने से इंकार कर दिया, एक लंबे संघर्ष में एक थीसिस लिखने के प्रयास में इसका (इस्लाम का) सहारा ले सकती हूँ तो बाकी लोग क्यों नहीं अपने पूरे जीवन में इस्लाम से ताकत ले सकते।”

बता दें कि ये पेपर 2017 में पब्लिश हुआ था। लेकिन इसके अलावा और भी ऐसे विवादस्पद पेपर पब्लिश हो चुके हैं जिनमें कश्मीर पर विवादित बातें कही गईं। TISS तुलजापुर में ऐसे ही एक रिसर्च छपी। इसका शीर्षक था-  “स्टेट्स कॉर्सिव एपरैट्स: ए स्टडी ऑफ मिलिट्री ऑक्यूपेशन इन कश्मीर”।

साभार: @BBTheorist/Twitter

एक अन्य थीसिस जो कश्मीर पर ही आधारित मिली, उसका शीर्षक देखिए- “प्रतिरोध के एक रूप में हिंसा: भारत-नियंत्रित-कश्मीर में 1989 के बाद के आत्मनिर्णय का एक अध्ययन।”

साभार: @BBTheorist/Twitter

एक पेपर में तो खुले तौर पर भारत से कश्मीर को आजाद करने की माँग की गई और भारत के विरुद्ध जंग को समर्थन दिया गया।

साभार: अभिनव प्रकाश

बता दें कि इन शोध पत्रों में से एक के ‘तर्कसंगत’ खंड में कहा गया है कि घाटी में संघर्ष 27 अक्टूबर, 1947 को भारत द्वारा किए गए जबरदस्त कब्जे का परिणाम है, जब तत्कालीन महाराजा रणबीर सिंह ने भारत के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए थे और लॉर्ड माउंटबेटन भारत सरकार और रियासत के बीच मध्यस्थ के तौर पर काम कर रहे थे।

लेखक कश्मीर पर तैयार किए गए अपने पेपर में बताते हैं कि कैसे कश्मीर ने ‘अधीनता’, ‘दमन’, ‘अत्याचार’, ‘सबसे खराब प्रकार’ की ‘सामूहिक कब्रें’ देखी हैं।

इससे पहले इस संबंध में अनन्या कुंडू ने अपने रिसर्च पेपर लिखा था, “भारत ने कश्मीर पर कब्जा करने के लिए यहाँ की आवाजों को दबाया और नैरेटिव को नियंत्रित किया। कश्मीर की कहानी कश्मीर नहीं, भारत ने लिखी। आज जिस कश्मीर को हम जानते हैं, वो भारतीय सोच के हिसाब से ही। महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा हुई। पितृसत्तात्मक भारतीय सेना कश्मीरी समाज को तोड़ने के लिए महिलाओं के शरीर को निशाना बनाती है। ये सैन्यीकरण और युद्ध का परिणाम ही है कि महिलाओं के खिलाफ यौन और शारीरिक हिंसा आम हो गई। भारत ने अगस्त 2019 में अनुच्छेद-370 हटा कर उसका विशेष राज्य का दर्ज छीन लिया। फिर लंबा कम्यूनिकेशन ब्लैकआउट हुआ। फिर कोरोना आपदा आई और वहाँ की महिलाओं के हालात और भी बदतर हो गए।”

उल्लेखनीय है कि जब इस संबंध में अभिनव प्रकाश ने पहले कुंडू का रिसर्च पेपर शेयर किया था, तो इसके बाद TISS ने स्टेटमेंट जारी किया था जिसमें लिखा गया था कि वह ऐसे शीर्षकों को बढ़ावा नहीं देते और इस संबंध में उपयुक्त एक्शन लिया जाएगा और सच की पड़ताल की जाएगी। लेकिन, सवाल उठता है कि आखिर ऐसे रिसर्च पेपर पब्लिश कैसे हुए अगर उन्हें कोई इंस्टिट्यूशनल सपोर्ट नहीं था।

कंचन गुप्ता को हाल में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की वरिष्ठ सलाहकार नियुक्त किया गया है। वह इस मामले में कहती हैं कि ये टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, 1936 में ‘सर दोराबजी टाटा ग्रेजुएट स्कूल ऑफ सोशल वर्क’ के रूप में स्थापित हुआ था, जो अब ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सबवर्सिव सेपरैटिज्म’ में बदल गया है।

अब देखना है कि इन पेपर्स के सामने आने के बाद ऐसी रिसर्च जो अलगाववाद को बढ़ावा देती हों उसके लिए किसको जिम्मेदार ठहराया जाएगा या किसके खिलाफ कार्रवाई होगी।

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