यदि सिद्धू रहा, जड़ से उखाड़ देगा इन्हें, जब चाहेगा कुर्ते की तरह झाड़ देगा इन्हें…

राजनीतिक दल के नेताओं को अधिकार है कि वे मंत्री, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, कोआपरेटिव वगैरह के चेयरमैन वगैरह नहीं हो सकते तो असंतुष्ट हो सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोकतंत्र में संतोष के लिए भले ही कोई स्थान न हो पर असंतोष के लिए बहुत स्थान है। जो संतुष्ट रहता है, वह किसी स्थान पर दिखाई नहीं देता। इसलिए नेता समय काल देखकर कर असंतुष्ट हो लेते हैं। उनके निवास स्थान पर आने जाने वालों की संख्या बढ़ जाती है तो आईबी का सिपाही मुख्यमंत्री कार्यालय को बताता है कि; आज फलाने विधायक आए थे निवास स्थान पर। परसों तो फलाने अपने साथ फलाने को लेकर आए थे। मुख्यमंत्री हाईकमान को रिपोर्ट भेजते हैं।

उधर से हाईकमान फोन करके पूछता है; आजकल आप कुछ बोल नहीं रहे? कारण क्या है? 

नेताजी नायक फिल्म के अमरीश पुरी की तरह मुँह पर अंगुली रख लेते हैं। उनका सहायक बोल पड़ता है; भैया जी असंतुष्ट हैं। 

हाईकमान पूछता है; क्यों? 

सहायक बोलता है; चुनाव आ रहे हैं। अब असंतुष्ट न होंगे तो कब होंगे? 

हाईकमान कहता है; चुनाव में तो अभी देर है। 

सहायक; पहले से इसलिए असंतुष्ट हैं ताकि दुख व्यक्त करने के लिए बता सकें कि राज्य में लोकतंत्र की हत्या हो रही है। कि मुख्यमंत्री विधायकों की नहीं सुनते।   

हाईकमान; अच्छा तो विधायक जी लोकतंत्र की हत्या से दुखी हैं?

सहायक; नहीं, दुखी तो मुख्यमंत्री से ही हैं पर अपने दुख जताने का काम वाया लोकतंत्र की हत्या के करते हैं। 

इसी मॉडल के सहारे नवजोत सिंह सिद्धू भी नाराज हुए हैं। नाराजगी की पिच पर ओपनिंग किए हुए उन्हें तीन बरस हो गए और अभी तक एक के एवरेज से खेले जा रहे थे। अब जाकर रन रेट बढ़ा है जब परगट सिंह के साथ पार्टनरशिप शुरू हुई है। परगट खुद भी कैप्टन रह चुके हैं इसलिए कैप्टन साहब के लिए अब मुश्किल हो गई है। इसी मुश्किल से निकलने के लिए दशकों पुराने राजनीतिक दर्शन के अनुसार हाईकमान ने कमेटी गठित कर दी और रिपोर्ट करने को कहा। तीन सदस्यीय कमेटी ने नवजोत सिद्धू से मुलाक़ात की। सिद्धू सही समय पर उपस्थित हुए। हाथ में मुहावरा समग्र नामक पुस्तक थी।     

मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा; सिद्धू साहब आपको कैप्टन साब से क्या प्रॉब्लम ऐ? आप अबी इतना बिजी काए हो गया ऐ?

सिद्धू;ओये गुरु, मिट्टी का ढेला गुलाबों की क्यारी में आ गया है, आज ये सिद्धू खरगे साहब की अँकवारी में आ गया है। और जब भी बात होगी नक्कार-ए-खुदा की, तो यही लगेगा कि कैप्टन बँसवारी में आ गया है, बँसवारी में आ गया है। ठोको ताली! 

खरगे; बट्ट, सिद्धू साब, अमको सोनिया जी ने बोला ऐ, सबसे बात करके उनको रिपोर्ट देना। अबी आप अइसा बासा बोल्येगा तो हमको क्या समज में आएगा?

हरीश रावत; अरे खरगे जी, इनके कहने का अर्थ है कि ये कैप्टन साहब से नाराज होकर आपके पास आए हैं और जब तक हाईकमान कैप्टन साहब को गुलाब की क्यारी से बँसवारी में नहीं भेजेगा, मतलब सीएम हाउस से किसी महत्वहीन जगह नहीं भेजेगा, तब तक ये शांत नहीं होंगे।

खरगे; आ! अइसा बोले ऐ सिद्धू साब। लेकिन ये आपने कइसे समजा?

रावत; अरे मुझे पता है खरगे जी। मैं भी बहुगुणा के राज में असंतुष्ट रह चुका हूँ। 

खरगे; फिर तो सही है। ये जो बी बोलेंगे, आप ट्रांसलेट करना। अच्छा, सिद्धू साहब, आपको कौन सा पद चाइए? कौन सा मिनिस्ट्री चाइए वो बताना।

सिद्धू; देखिए खरगे साहब, आप मेरा मेसेज सोनिया जी तक पहुँचाइए और उनसे कहिए कि आकाश की कोई सीमा नहीं, और पृथ्वी का कोई मोल नहीं, साधु की कोई जात नहीं और पारस और सोनिया जी का कोई मोल नहीं, कोई मोल नहीं। ठोको। 

खरगे; ये पारस कौन ऐ?

रावत; अरे पारस से सिद्धू साहब का मतलब राहुल जी से है। 

खरगे; पारस तो कुच ओता ऐ न जिसके चूने से सबी चीज सोना बन जाता ऐ? 

रावत; हाँ, खरगे साहब, पारस एक पत्थर होता है जो किसी भी चीज को छू ले तो वो चीज सोना बन जाती है। कोई भी चीज। धूल, मिट्टी, लोहा, तांबा आलू सब कुछ उसके छूने से सोना बन जाता है। दरअसल सिद्धू साहब कहना चाहते हैं कि इनकी माँग बहुत बड़ी है और उस माँग की आकाश के जैसे कोई सीमा नहीं है और पृथ्वी के जैसा ही कोई मोल नहीं है। साधु की कोई जाति नहीं होती से सिद्धू साहब का तात्पर्य है कि ये प्रदेश अध्यक्ष बनना चाहते हैं पर कैप्टन साहब किसी जाट को प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाना चाहते। कैप्टन साहब चाहते हैं कि कोई दलित प्रदेश अध्यक्ष बने। इसीलिए सिद्धू साहब कह रहे हैं कि साधु की कोई जात नहीं होती क्योंकि सिद्धू साहब का मानना है कि साधु शब्द की उत्पत्ति सिद्धू शब्द से हुई है। 

खरगे; ओ! ये तो मैं जानता नही ता कि साधु वर्ड सिद्धू वर्ड से बना ऐ। 

सिद्धू; ये सत्य है। ये सत्य है। और सिद्धू सत्य बोलता है। जैसे अणु के बिना परमाणु नहीं बनता, व्यक्ति के बिना समाज नहीं बनता, वैसे ही कार्यकर्ता बिना पार्टी नहीं बनती, और सिद्धू के बिना माल नहीं छनता, माल नहीं छनता गुरु। सिकंदर हूँ मैं, सिकंदर, और सिकंदर हालात के आगे कभी नहीं झुकता, तारा टूट भी जाए तो जमीन पर नहीं गिरता, अरे मैं तो फ़कीर की वेश में बादशाह हूँ, सिद्धू कभी जंगल-जंगल नहीं फिरता। गिरते हैं हज़ारों दरया समंदर में, पर कोई समंदर दरया में नहीं गिरता। ठोको ताली।

खरगे ने रावत की ओर देखा। इससे पहले कि कुछ कहते, रावत जी बोल पड़े; सिद्धू साहब के कहने का तात्पर्य यह है कि इनके साथ इस समय दो दर्जन विधायक हैं पर ये असंतुष्ट राजनीति के सिद्धांत के अनुसार खुद को पार्टी का कार्यकर्त्ता बता रहे हैं। इनका कहना है कि ये चमकते हुए तारे हैं और टूट भी जाएँगे तो भी जमीन पर गिरेंगे नहीं। ये दरिया हैं और नदी में नहीं गिरेंगे। विधायक वगैरह चमका कर हाईकमान से बार्गेनिंग कर ही लेंगे। 

खरगे; ठीक ऐ ये दरिया ऐ और कैप्टन नदी ऐ पर अबी ये यिलेक्शन यीयर ऐ सिद्धू साब। अइसा करने से तो पार्टी का बहुत लॉस। ये सुना ऐ कि सीएम के पास यम-यल-ए लोगों के करप्शन का डोज्जियर ऐ। क्या ये सच ऐ? अइसा क्यों हुआ?

सिद्धू; खरगे साहब, स्वाभिमान वो सात्विक सुगन्धित फूल है जिसके इर्द गिर्द गुणों के भँवरे गुन्चित रहते हैं। मैं तो कहूँगा कि ओये गुरु, है अँधेरा बहुत, अब सूरज निकलना चाहिए, जैसे भी हो, ये मौसम बदलना चाहिए, जो चेहरे रोज बदलते हैं नक़ाबों की तरह, अब जनाजा धूम से उनका निकलना चाहिए। खटैक! यदि सिद्धू रहा, जड़ से उखाड़ देगा इन्हें, जब चाहेगा कुर्ते की तरह झाड़ देगा इन्हें, ख़लक-ए-खुदा खड़ा है आज मेरे साथ, चावल खुद खाएगा और माड़ देगा इन्हें। ठोको ताली!

जेपी अग्रवाल बोले; मुझे समझ में तो नहीं आया पर जिस लहजे में आप बोल रहे हैं, उसे सुनकर लगा कि आपकी माँगें बहुत बड़ी हैं। रावत जी, आपकी समझ में आया?

रावत बोले; हाँ, समझ में आया। इनके कहने का अर्थ है कि अँधेरा बहुत मतलब कप्तान साहब ने अंधेर मचा रखा है और सूरज निकलना चाहिए से मतलब है अब ये अंधेर बंद होना चाहिए और मौसम बदलना चाहिए से इनका मतलब है कप्तान साहब सीएम पद छोड़ें और सिद्धू साहब सीएम बनें। ऐसा न हुआ तो ये कप्तान साहब को जड़ से उखाड़ देंगे। सिद्धू साहब, मैं सही समझ रहा हूँ?

सिद्धू बोले; रावत जी, आप शत प्रतिशत सच समझ रहे हैं। मैं कहना चाहूँगा कि; गन्ने में फूल नहीं होता, राजा दीर्घजीवी नहीं होता, पहाड़ ऊँचा होता है, समंदर गहरा होता है, चिड़िया आसमान में उड़ती है और आदमी जमीन पर चलता है, आया है सो जाएगा राजा रंक फ़कीर, कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कभी जमीं तो कभी आसमां नहीं मिलता। 

खरगे; यई यई जो लास्ट में आप बोला, मुकम्मल जहां वाला बात। सिद्धू साब हमने आपकी बात सुनी और हम सोनिया जी तक अपनी रिपोर्ट पहुचा देंगे और जो बी करेंगे पार्टी का इत में करेंगे। आप रेस्ट एश्योर्ड रहे।

सिद्धू साहब ने अपनी पुस्तक मुहावरा समग्र को उठाया और चले गए। 

अचानक खरगे ने रावत से पुछा; आप जब असंतुष्ट उआ था तब क्या उआ था? सीएम बन गया था?

दोनों ने एक दूसरे को देखा और फिर मिलकर अग्रवाल जी को देखा और तीनों हँस पड़े। रिपोर्ट हाईकमान तक पहुँच चुकी है।

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