हिन्दुओं के हत्यारे गाजी मियाँ के दर पर ओवैसी और ओमप्रकाश राजभर: राजा सुहेलदेव ने किया था अंत, चेले कहते थे ‘बालेमियाँ कृष्ण’

हाल ही में अपने उत्तर प्रदेश दौरे पर बहराइच पहुँचे AIMIM के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने गाजी सैयद सालार मसूद की मजार पर जाकर चादर चढ़ाई। इसे लेकर वहाँ की राजनीति में बवाल मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश सरकार में पिछड़ा मामलों के कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर ने इसे महाराजा सुहेलदेव का अपमान बताया है। बता दें कि असदुद्दीन ओवैसी ने यूपी में ओमप्रकाश राजभर को अपना साथी बनाया है।

राजभर समुदाय महाराजा सुहेलदेव को अपना पूर्वज मानता है और इस समाज में उनका विशेष सम्मान है। अनिल राजभर ने कहा कि देश के लुटेरों और आक्रांताओं का सम्मान और महापुरुषों के अपमान को इन लोगों ने एक फैशन बना लिया है। असल में जब असदुद्दीन ओवैसी गाजी सैयद सालार मसूद की मजार पर चादर चढ़ा रहे थे, तब ओमप्रकाश राजभर भी उनके साथ मौजूद थे। इससे उनके दोहरे रवैये पर सवाल उठ रहे हैं।

अनिल राजभर का कहना है कि राष्ट्रवीर महाराजा सुहेलदेव ने जिस विदेशी आक्रांता गाजी सैयद सालार मसूद को परास्त किया था, उसी की मजार पर चादर चढ़ाकर असदुद्दीन औवैसी और ओम प्रकाश राजभर ने राजभर समाज के स्वाभिमान पर चोट की है। वहीं उत्तर प्रदेश के पूर्व DGP व राज्यसभा सांसद ने कहा कि गाजी सैयद सालार मसूद ने हिन्दुओं का कत्लेआम किया था और धर्म ग्रंथों को तहस-नहस किया था।

उन्होंने बताया कि उसे महाराजा सुहेलदेव ने सन् 1034 के एक युद्ध में मार गिराया था। उन्होंने जानकारी कि गाजी भारत में कई बार आक्रमण करने वाले मौमूद गजनवी का भांजा था। उन्होंने पूछा कि वहीं पर सुहेलदेव की भी प्रतिमा है, लेकिन ओवैसी वहाँ क्यों नहीं गए? उन्होंने ओमप्रकाश राजभर की चुप्पी को दर्दनाक बताते हुए कहा कि इन्होंने तुष्टिकरण की हदें पार कर दी हैं। उन्होंने बताया कि इस्लामी आक्रांता फिरोजशाह तुगलक ने उसका मजार बनवाया था।

गाजी सैयद सालार मसूद का इतिहास: इस्लामी आक्रांता, जिसे दिखाया गया संत

जैसा कि हम अजमेर के ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के बारे में जान चुके हैं, उसने पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ जिहाद के लिए भारत का रुख किया था। ठीक उसी तरह गाजी सैयद सालार मसूद का भी भारत में आना इसी तरह की साजिश का हिस्सा था। इस्लामी आक्रांताओं का गुणगान करने वाले वामपंथियों की मानें तो हिन्दू उसे प्यार से ‘बाले मियाँ’ और ‘हठीला’ कहते थे, बाल श्रीकृष्ण से उसकी तुलना करते थे।

उसने ज़ुहरा बीबी नाम की एक लड़की से शादी की थी। दावा किया जाता है कि उसने उस लड़की का अंधापन ठीक कर दिया था। हालाँकि, आपको भारत में आए सूफियों और फकीरों के बारे में कई ऐसी कहानियाँ मिलेंगी, जहाँ उन्होंने किसी लड़की या उसके परिवार पर इस तरह का ‘चमत्कार’ कर के उससे शादी की हो। इतिहासकार एना सुवोरोवा ने तो गाजी मियाँ की तुलना श्रीकृष्ण और श्रीराम तक से कर दी है और कहा है कि हिन्दू उसे इसी रूप में देखते थे।

बहराइच ही नहीं, बल्कि कई स्थानों पर उसके मजार बनवाए गए और साथ ही उसके मकबरे को सारे धर्मों के मेल वाला स्थल घोषित करने की माँग होती रही है। गाजी सैयद सालार मसूद बचपन से ही एक योद्धा के रूप में प्रशिक्षण ले रहा था और इस्लाम के प्रति कट्टरता का भाव उसके मन में भरता ही जा रहा था। मीरत-ए-मसूदी में उसका इतिहास मिलता है। इसमें बताया गया है कि महमूद गजनवी को सोमनाथ का मंदिर ध्वस्त करने की सलाह गाजी ने ही दी थी।

अपनी युद्धकला और इस्लाम के प्रचार-प्रसार की ललक के कारण महमूद गजनवी बचपन से ही उसकी बात मानता था। इसीलिए, जब उसने भारत पर आक्रमण की अनुमति माँगी और यहाँ इस्लाम को फैलाने की बात की तो उसे इजाजत दे दी गई। मात्र 16 वर्ष की उम्र में उसने सिंधु नदी को पार कर के मुल्तान पर अपना कब्ज़ा जमा लिया और 18 महीने बाद वो दिल्ली आ धमका। मामा गजनी की फ़ौज की सहायता से वो 6 महीने तक दिल्ली में रहा।

इसके बाद वो मेरठ के लिए निकल गया। शुरुआती दिक्कतों के बाद उसे वहाँ ही जीत नसीब हो गई। इसके बाद वो कन्नौज गया, जहाँ के राजा ने एक दोस्त की तरह उसका स्वागत किया। ‘Gazetteer of the Province of Oudh, Volume 1‘ पुस्तक के अनुसार, यहाँ कुछ दिन बिताने के बाद वो सतरिख पहुँचा। आज के बाराबंकी स्थित ये जगह उस समय देश के सबसे फूलते-फलते नगरों में से एक था, ऐसे में इसका आक्रांताओं की नजर इस पर लगनी ही थी।

हालाँकि, इतिहासकारों में इसे लेकर मतभेद है कि वो जगह सतरिख आज की बाराबंकी वाली है या फिर अयोध्या। जहाँ गाजी मसूद पहुँचा, वो हिन्दुओं के लिए के लिए एक पवित्र जगह हुआ करती थी। यहाँ आकर उसे चारों तरफ अपने आदमियों को भेज कर इस्लाम का प्रचार-प्रसार करने को कहा। बहराइच में अपने और अपनी फ़ौज के लिए वो सिद्धौर और अमेठी से सप्लाई मँगाता था। उसने वाराणसी से लेकर कई जगहों पर अपने दूत भेजे।

बहराइच और मानिकपुर के कुछ सरदारों ने जरूर उससे युद्ध किया, लेकिन तब तक उसका अब्बा सालार साहू अपनी फ़ौज लेकर वहाँ आ पहुँचा था और उसने बेटे की राह आसान कर दी। बहराइच के बगल में ही एक सूर्य मंदिर और कुंड हुआ करता था। हिन्दू वहाँ पूजा-पाठ करते थे। उसने वहाँ पर ‘काफिरों’ को सबक सिखाने के लिए एक मस्जिद बनवाने की घोषणा की, लेकिन तब तक विपक्षी सेना की कमान राजा सुहेलदेव के हाथ में आ चुकी थी।

भारत के गर्व राजा सुहेलदेव ने जैसे ही गाजी सैयद सालार मसूद के विरुद्ध मोर्चा संभाला, हिन्दू सेना एक हो गई और उनके भीतर नया जोश भर गया। 15 दिनों से भी अधिक के युद्ध के बाद राजा सुहेलदेव उसके कैम्प के पास पहुँचे और उसे उसके कई साथियों सहित मार गिराया। इसके बाद उसके अनुयायियों ने उसी सूर्य मंदिर वाली जगह या उसके आसपास में उसे दफना दिया। हालाँकि, इस्लामी इतिहासकारों ने इस बेइज्जती को अपने इतिहास में जगह ही नहीं दी।

मिरत-ए-मसूदी में महमूद गजनी द्वारा सोमनाथ पर हमले का महिमामंडन किया गया है। वामपंथी इतिहासकार कहते हैं कि राजा सुहेलदेव का गाजी मियाँ के साथ युद्ध हुआ ही नहीं। कुछ कहते हैं कि उसका इतिहास कई सालों बाद लिखे जाने के कारण स्पष्ट नहीं है तो कुछ ये दलील देते हैं कि महमूद गजनी के इतिहास में उसका जिक्र नहीं है। जबकि आमिर खुसरों जैसों ने भी अपनी लेखनी से इस्लाम के प्रचार के लिए उसका गुणगान किया है

ब्रिटिश काल में अंग्रेज अधिकारी भी ये देख कर हैरान थे कि जिस गाजी मियाँ ने हिन्दुओं पर अत्याचार किया, उसी की मजार पर हिन्दू जाते हैं। प्रोफेसर डीसी बेली का कहना है कि गाजी मियाँ को ‘भगवान’ बनाए जाने के लिए उस समय के पिछड़ों का धर्मांतरण किया गया होगा और उनके मन में गाजी के प्रति ये भाव भरा गया होगा। अंग्रेज विलियम स्लीमन ने कहा था कि हिन्दुओं को मौत के घाट उतारने वाले गाजी की मजार पर हिन्दू-मुस्लिम दोनों जाते हैं।

Updated: October 1, 2021 — 3:57 pm

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