2024 के लोकसभा चुनाव की बात करना जल्दबाजी है फिर भी हमें बात करनी होगी: जानिए क्यों?

नरेंद्र मोदी के अलावा अटल बिहारी वाजपेयी ही एकमात्र भाजपा नेता थे जो भारत के प्रधानमंत्री बन सके और अपना एक कार्यकाल पूरा कर सके। वाजपेयी को भी अपने कार्यकाल के दौरान वैसा ही विरोध और प्रोपेगेंडा झेलना पड़ा जो नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान झेला और दूसरे कार्यकाल में भी (और भी व्यवस्थित और प्रखर रूप में) झेल ही रहे हैं। 

उदाहरण के लिए 1999 में जब वाजपेयी सत्ता में आए तो यह दावा किया गया कि ‘ईसाई खतरे में हैं’ और ऐसा ही कुछ नैरेटिव मोदी के 2014 में सत्ता में आने के बाद चलाया गया। इसके अलावा भी कई ऐसे संयोग हैं। मोदी के कार्यकाल में जहाँ राफेल लड़ाकू विमान की खरीद में घोटाले की बात प्रचारित की गई, ठीक वैसे ही आरोप वाजपेयी के शासनकाल में हथियारों और ताबूत की खरीद में भी लगे थे। कॉन्ग्रेस ने मोदी के द्वारा की गई बालाकोट एयर स्ट्राइक पर प्रश्न उठाया था, वहीं वाजपेयी के कार्यकाल में कारगिल विजय पर भी संदेह उत्पन्न किया गया। 

मोदी के द्वारा ‘अच्छे दिन’ के वादों को झूठ बताया गया जैसे वाजपेयी के ‘इंडिया शाइनिंग’ को बताया गया था। मोदी पर यह आरोप लगाया गया कि मोदी सरकार ने कुछ उद्योगपतियों (सूट-बूट की सरकार का तंज) के लिए ही काम किया है, जबकि वाजपेयी से पूछा गया कि आम आदमी को क्या मिला? ऐसी कई समानताएँ हैं लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि वाजपेयी को हराने के लिए जो रणनीति बनाई गई थी वही मोदी के लिए भी उपयोग में लाई गई। विरोधियों को यह लगा कि इतिहास एक बार फिर दोहराया जाएगा और जैसे वाजपेयी 2004 में हार गए वैसे ही 2019 में मोदी भी सत्ता से बाहर हो जाएँगे।   

इस बात का गवाह है एक विरोधी का यह विश्वास।

2016 मे मैंने बताया था कि कैसे मोदी ऐसे ही एक व्यवस्थित प्रोपेगेंडा का सामना कर रहे हैं और अपनी रणनीति बनाते समय उनके मन में क्या चलता होगा? मैंने कुछ ऐसा लिखा था,

“2014 का जनादेश ऐसा प्रतीत हो सकता है कि अब मोदी, गाँधी परिवार के पीछे पड़ेंगे और अनेकों फ्री मार्केट आधारित नीतियों का निर्माण करेंगे लेकिन उनकी नीतियाँ निर्धारित होंगी 2004 के परिणामों से। 2014 और 2015 में होने वाली राजनैतिक घटनाओं ने यह तो साफ कर दिया कि मोदी के सामने 2014 को दोहराने की चुनौती नहीं है बल्कि 2004 में जो हुआ उसे रोकने की है क्योंकि विरोधियों ने जो वाजपेयी के साथ किया वही अब भी कर रहे हैं।“

अब 5 साल बाद मैं फिर से यह सब 2024 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर लिख रहा हूँ। क्योंकि अचानक से Covid-19 संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान एक बार फिर से यह चर्चा उठ रही है। हालाँकि सौभाग्य से संक्रमण कम हो रहा है लेकिन संक्रमण की इस दूसरी लहर ने जो नुकसान किया है वह लंबे समय तक रहेगा।

विरोधी खुश हैं। लोगों के मरने और व्यवस्था के चरमरा जाने के बाद भी वो अपनी खुशी को छुपाने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। एक बड़े अंतराल के बाद इन विरोधियों को मौतें और तबाही देखने को मिली है जिसका वो सालों से इंतजार कर रहे थे। एक ऐसा अवसर जब वो कह सकें, “देखो मैंने कहा था कि फासीवाद अपने साथ यही लाएगा।“

2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद से ही लिबरल्स और विरोधियों ने मौत और तबाही के मंजर का डर दिखाया। कभी ईसाइयों और उनके चर्चों पर हमले का डर तो कभी भारत की गलियों में मुसलमानों की लिंचिंग का डर। इसके अलावा कहा गया कि हर जगह महिलाओं का बलात्कार (‘गाय सुरक्षित हैं’ तो याद ही होगा आपको) हो रहा है और विमुद्रीकरण (नोटबंदी) में लाइन में खड़ा हुआ हर दूसरा आदमी मर रहा है। हालाँकि इस नैरेटिव से किसी को अंतर नहीं पड़ा लेकिन अंततः चीन के इस वुहान वायरस ने विरोधियों को वो मौका दे ही दिया क्योंकि इस बार हुई मौतें और नुकसान वास्तविक है। 

इसलिए उनके टूलकिट में वायरस से जुड़ी सभी चीजों को मोदी और उनकी नीतियों से जोड़ देने की बात कही गई है। क्योंकि यदि ‘फासीवाद ही वायरस इन्फेक्शन’ का कारण है कहा जाएगा तो यह इंस्टाग्राम की पीढ़ी को भी हजम नहीं होगा। वैसे देखा जाए यो यह वायरस वामपंथ की देन है।  

अब इस बात पर आते है कि यह सब 2024 के लोकसभा चुनावों में किस प्रकार असर करेगा। पहली बात तो यह कि फिलहाल इस विषय पर कुछ भी कहना या विश्लेषण करना जल्दबाजी होगी क्योंकि इस वायरस की कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है और इसी कारण हम यह नहीं कह सकते आगे क्या होने वाला है।

हालाँकि, एक बात तो स्पष्ट है कि यदि पिछली बार मोदी ने यह तय किया था कि जो वाजपेयी के साथ 2004 में हुआ वह उनके साथ नहीं होगा तो 2024 में भी मोदी निश्चित रूप से यह ध्यान में रखेंगे कि उनके साथ वो सब न हो जो मनमोहन के साथ 2014 में हुआ।

मोदी समर्थकों के लिए मनमोहन से मोदी की तुलना अस्वीकार्य हो सकती है, तो यह सही है कि मोदी की तुलना मनमोहन से नहीं हो सकती है जैसी कि मोदी और वाजपेयी में संभव है। लेकिन यहाँ दो व्यक्तिव की तुलना नहीं बल्कि दो चुनौतियों की तुलना की गई है। 2019 में मोदी के सामने वही चुनौतियाँ थीं जो वाजपेयी के सामने एक कार्यकाल के बाद उत्पन्न हुई थीं लेकिन 2024 में मोदी के सामने दो कार्यकाल पूरा करने वाले प्रधानमंत्री की चुनौतियाँ होंगी।

हालाँकि यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि आखिर तुलना मनमोहन सिंह से क्यों की गई, जो इंदिरा गाँधी से भी की जा सकती थी। मैं यह मान कर चल रहा हूँ कि अब के समय में ऐसा कुछ नहीं होने वाला जो इंदिरा गाँधी के कार्यकाल में हुआ था। पाकिस्तान के साथ युद्ध, संस्थाओं पर नियंत्रण और आपातकाल। जितना मोदी समर्थक यह चाहते हैं कि इन घटनाओं में से कम से कम दो तो होनी ही चाहिए लेकिन मैं (कम से कम एक तो होना चाहिए) मानता हूँ कि फिलहाल ऐसा कुछ होने वाला नहीं है। इसलिए मैं इंदिरा गाँधी से मोदी के कार्यकाल की तुलना नहीं कर रहा हूँ।

मोदी को यह सुनिश्चित करना होगा कि 2014 में कॉन्ग्रेस की हार के जो कारक सामने आए वो 2024 में मोदी सरकार पर लागू न हों। हालाँकि यह आसान है क्योंकि 2014 में कॉन्ग्रेस बड़े घोटालों के कारण हारी थी लेकिन मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है। राफेल डील में घोटाले के झूठे नैरेटिव के बावजूद मोदी की छवि पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और आगे भी यह छवि बेदाग ही रहने वाली है लेकिन अब यह घोटालों और भ्रष्टाचार से भी कहीं अधिक है। 

मैं मानता हूँ कि भ्रष्टाचार का आरोप मात्र एक उत्प्रेरक था मुख्य कारण नहीं, जिसके कारण कॉन्ग्रेस चुनाव हार गई। कॉन्ग्रेस जिन कारणों से हारी उनके बारे में आगे बताया गया है।

कॉन्ग्रेस का अपना इकोसिस्टम :

पूरा भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन कॉन्ग्रेस के द्वारा बनाए गए इकोसिस्टम का एक आइडिया ही था। लेकिन इस इकोसिस्टम ने बाद में यह सोचा कि कॉन्ग्रेस से सत्ता में हिस्सेदारी करने से अच्छा है कि खुद ही सत्ता प्राप्त की जाए। 2011-12 के अरब आंदोलन के बाद इस इकोसिस्टम को यह उम्मीद मिली कि भारत में भी सत्ता परिवर्तन हो सकता है। हालाँकि जल्दी ही इकोसिस्टम का यह भ्रम टूट गया और दिल्ली (आम आदमी पार्टी के रूप में) के अलावा भारत के दूसरे हिस्से में यह इकोसिस्टम सफल नहीं हो सका। हालाँकि तब तक इस इकोसिस्टम ने कॉन्ग्रेस के खिलाफ माहौल बना दिया था।  

अहंकार और अस्वीकार्यता :

कॉन्ग्रेस की पराजय में उसके नेताओं का अहंकार और वास्तविक परिस्थितियों के विषय में उनकी अस्वीकार्यता महत्वपूर्ण कारक बने। कॉन्ग्रेस के नेताओं ने अहंकार में अन्ना हजारे जैसे लोगों को सर से पाँव तक भ्रष्टाचारी बता दिया। वहीं जमीनी स्तर पर काम कर रहे कार्यकर्ताओं द्वारा मिली हकीकत को भी नकारते हुए कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने ‘सब कुछ ठीक है’ का रवैया अपनाया। इसके अलावा कॉन्ग्रेस द्वारा चलाया गया ‘भगवा आतंक’ का प्रोपेगेंडा हिन्दुत्व के मुद्दे को और हवा दे गया।

विकल्प के रूप में मोदी :

कॉन्ग्रेस देश में लगातार विजयी रही क्योंकि उसके पीछे कारण था किसी भी विकल्प की अनुपस्थिति (TINA-There Is No Alternative). लेकिन मोदी ने गुजरात में मुख्यमंत्री के तौर पर किए गए कार्यों, अपनी भाषण शैली और अपनी सशक्त छवि के कारण देश को यह भरोसा दिलाया कि वही एक विकल्प हैं। मोदी, कॉन्ग्रेस या उसके किसी भी नेता का एक बड़ा विकल्प बनकर उभरे।

2014 में जो कॉन्ग्रेस के साथ हुआ वह 2024 में मोदी के साथ न हो इसके लिए मोदी सरकार को अपने इकोसिस्टम को खुश रखना होगा और सभी सुझावों को सुनना होगा लेकिन भाजपा का इकोसिस्टम या दक्षिण पंथ (Right Wing) है कहाँ?

अब यह ‘राइट विंग इकोसिस्टम’ बहस का विषय है और इस पर एक पूरी पुस्तक लिखी जा सकती है। लेकिन हम इस तरह से समझ सकते हैं कि भाजपा को उन लोगों का ध्यान रखना चाहिए जो दूसरों को प्रभावित कर सकते हैं। पार्टी और सरकार को यह विचार करना चाहिए कि ऐसे लोग नाखुश या दुखी किन कारणों से हो सकते हैं। हालाँकि सुब्रमन्यन स्वामी जैसे लोगों पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए लेकिन हर किसी को नजरअंदाज करना एक बड़ा नुकसान कर सकता है।

फिलहाल कोई भी ऐसा नहीं है जो मोदी के विकल्प के रूप में उभर सके। इकोसिस्टम भी अब यह जान चुका है कि उसे अब दोबारा कॉन्ग्रेस के खिलाफ नहीं जाना चाहिए। अब यह इकोसिस्टम राहुल गाँधी को एक राष्ट्रीय नेता बनाना चाहता है। हालाँकि यहाँ दो परिस्थितियाँ हैं, या तो यह इकोसिस्टम यह जानता है कि राहुल को नेता बनाने का कोई फायदा नहीं या फिर इकोसिस्टम अभी भी इसी आशा में है कि राहुल गाँधी नेतृत्व कर सकते हैं।

लेकिन यदि लोग परिवर्तन की इच्छा रखेंगे तो ऐसा नेता भी उपयोगी दिखाई देगा। 2014 के दौरान भ्रष्टाचार परिवर्तन का वाहक बना था लेकिन मोदी के लिए दुर्भाग्य से यह वायरस लोगों में परिवर्तन की इच्छा को जगा सकता है। यह आवश्यक नहीं कि सभी यह मानते हों कि मोदी निजी तौर पर इन सब के लिए जिम्मेदार हैं या कोई और इस महामारी से बेहतर तरीके से निपट सकता है लेकिन ‘बदलाव होना चाहिए’ यह प्रवृत्ति 2024 में लोगों के बीच घर कर सकती है।    

पूरा कॉन्ग्रेस-लेफ्ट इकोसिस्टम 2024 तक इस बदलाव की झूठी उम्मीदों को जिन्दा रखने की पूरी कोशिश करेगा। फासीवाद का रोना रोकर भी जो अवसर न मिल पाया, इस इकोसिस्टम को यह अवसर वायरस में दिखाई दिया है।

लेकिन मोदी के पास समय और ताकत दोनों हैं कि वो परिवर्तन ला सकें और ‘परिवर्तन होना चाहिए’ इस भ्रम को दूर कर सकें।

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