Chhattisgarh Edit: धान के मुद्दे पर भ्रम

Updated: | Fri, 26 Mar 2021 02:23 AM (IST)

रायपुर। Chhattisgarh Edit: राजीव गांधी किसान न्याय योजना की चौथी किस्त मिलने के बाद प्रदेश भर में विरोध के स्वर उभरे हैं। प्रति क्विंटल धान की 2,500 रुपये कीमत मिलने की उम्मीद लगाए किसानों को निराशा हुई है। कारणों की पड़ताल की जाए तो कहीं-न-कहीं संवाद की कमी के कारण यह स्थिति बन रही है। कहा जा सकता है कि विभागीय अधिकारी और कर्मचारी प्रदेश सरकार की योजना को किसानों तक पहुंचाने में नाकाम रहे हैं। एक तरफ किसानों की चाहत है कि कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार वर्ष 2018 के चुनावी घोषणापत्र के हिसाब से धान की कीमत का भुगतान करे, दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने प्रदेश के किसानों को धान के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक कीमत दिए जाने की सूचना के आधार पर सख्त रवैया अपना लिया है।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल स्वयं केंद्रीय खाद्य आपूर्ति मंत्री पीयूष गोयल से मिलकर राज्य का पक्ष रख रहे हैं। यद्यपि केंद्र का साफ कहना है कि अलग-अलग राज्य अगर धान की अलग-अलग कीमत देंगे तो अराजक स्थिति उत्पन्न् हो जाएगी। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही खरीदारी होनी चाहिए। यह विदित है कि सभी राज्य सरकारें अपने-अपने प्रदेश में केंद्र सरकार के लिए खरीदारी करती हैं। मंडी की बेहतर व्यवस्था होने के कारण पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों से केंद्रीय पूल में 70 फीसद खरीदारी होती है।

मुख्यमंत्री बघेल ने मंडी व्यवस्था को सुधारने और किसानों को लाभकारी स्थिति में पहुंचाने के लिए पहल की। इसका ही परिणाम रहा कि प्रदेश में धान की खेती करने वाले निबंधित किसानों की संख्या पिछले दो वर्षों में तीन लाख बढ़कर 21 लाख हो गई। रकबा भी 27 लाख हेक्टेयर हो गया। इसकी वजह से जहां वर्ष 2017-18 में 56 लाख टन धान की खरीद हुई थी, वर्तमान वर्ष में 83 लाख टन से अधिक धान की राज्य सरकार ने खरीद की है।

मुश्किलें इसलिए भी पैदा हो गई हैं कि केंद्र सरकार ने अपनी निगरानी व्यवस्था के आधार पर सख्ती करते हुए चावल खरीद का पूर्व में निर्धारित 60 लाख टन का लक्ष्य घटाकर 44 लाख टन कर दिया। इसकी वजह से राज्य सरकार को धान खरीद मद में ग्यारह हजार करोड़ रुपये अलग से खर्च करने पड़ेंगे। प्रदेश सरकार ने किसानों से किए वादे को निभाने के लिए बचाव का रास्ता निकाला है। राजीव गांधी न्याय योजना के तहत किसानों को प्रति एकड़ दस हजार रुपये का भुगतान करने की व्यवस्था की है।

राज्य का तर्क है कि यह खेती के लिए प्रोत्साहन राशि है, धान के लिए नहीं। ऐसे में देखा जाए तो किसानों के हित में केंद्रीय व्यवस्था के विरुद्ध काम करके भी राज्य सरकार किसानों के असंतोष का सामना करने जा रही है। सरकारी एजेंसियों को चाहिए कि जमीनी सच्चाई से किसानों को जल्द से जल्द अवगत कराएं अन्यथा केंद्रीय खरीद कम किए जाने से उन्हें और प्रदेश को ही नुकसान होगा।

Posted By: Shashank.bajpai

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